भारत बंद का महासंग्राम: सड़कों पर उतरे किसान और मजदूर, मोदी सरकार के खिलाफ ‘चक्का जाम
झारखण्ड|13 फरवरी, 2026 केंद्र सरकार की नीतियों और नए श्रम कानूनों के विरोध में 10 प्रमुख ट्रेड यूनियनों और विभिन्न किसान संगठनों द्वारा बुलाया गया 24 घंटे का ‘भारत बंद’ कल (12 फरवरी) संपन्न हुआ। आज, 13 फरवरी को देश के अधिकांश हिस्सों में जनजीवन सामान्य पटरी पर लौट रहा है, हालांकि कुछ राज्यों में विरोध प्रदर्शनों का असर अब भी देखा जा रहा है।
किन राज्यों में दिखा सबसे ज्यादा असर?
रिपोर्ट्स के अनुसार, बंद का सबसे व्यापक प्रभाव ओडिशा, केरल, पश्चिम बंगाल और असम में देखने को मिला। इन राज्यों में सार्वजनिक परिवहन और निजी बस सेवाएं काफी हद तक ठप रहीं, जिससे यात्रियों को परेशानियों का सामना करना पड़ा। इसके विपरीत, दिल्ली-एनसीआर, उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में बंद का असर आंशिक रहा। यहाँ बाजार खुले रहे और परिवहन सेवाओं पर कोई बड़ा प्रभाव नहीं पड़ा। झारखंड में भी इसका असर देखा गया। 12 फरवरी को मनरेगा मजदूर मंच के द्वारा गिरिडीह जिले के कई जगहों पर सड़क पर उतरकर आम हड़ताल को सफल किया गया। इसी क्रम में गिरिडीह के ग्राम श्यामसिंह नावाडीह मोड़ में भारत ज्ञान विज्ञान समिति के प्रदेश महासचिव सह किसान नेता विश्वनाथ सिंह और मजदूर मंच के प्रदेश संयोजक मो.आलम अंसारी के नेतृत्व में भारत बंद को सफल करने के लिए सड़क पर उतरे ।
हड़ताल का आह्वान मुख्य रूप से निम्नलिखित मुद्दों को लेकर किया गया था:
नए श्रम कानून (Labour Codes): यूनियनों का तर्क है कि ये कोड मजदूरों के अधिकारों को कमजोर करते हैं।
निजीकरण: सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs) के निजीकरण के खिलाफ विरोध।
व्यापार समझौते: भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की कुछ शर्तों पर असहमति।
इस पर दौरान प्रदेश के प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता किसान नेता विश्वनाथ सिंह ने कहा कि जैसे-जैसे भारत अमेरिका व्यापार समझौते का विवरण धीरे-धीरे सामने आ रहा है यह स्पष्ट होता जा रहा है कि भाजपा नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने तथा कथित “अंतरिम समझौते” में संयुक्त राज्य अमेरिका के सामने व्यापक रियायतें दे दी है। ये रियायतें भारत की अर्थव्यवस्था, कृषि और राष्ट्रीय संप्रभुता के लिए गंभीर खतरा पैदा करती है। सार्वजनिक क्षेत्र में उपलब्ध आंशिक जानकारी के अनुसार भी, भारतीय सरकार ने अमेरिकी निर्यात जैसे :-फल, कपास, वृक्षीय मेवे, सोयाबीन तेल और कुछ अन्य खाद एवं कृषि उत्पादों पर कोई शुल्क न लगाने पर सहमति दी है। यह निर्णय देश भर के लाखों सेव उत्पादकों, कपास और सोयाबीन किसानों की आजीविका को गंभीर नुकसान पहुंचाएगा। साथ ही साथ अमेरिका से दलहन की आयात पर भी सहमति बनी है जिससे भारतीय उपभोक्ताओं को महंगी दाल मिलेगी।
वहीं मनरेगा मजदूर मंच के मोहम्मद आलम ने कहा कि भारत सरकार मनरेगा को खत्म कर गरीबों के रोजगार पर चोट कर रही है एवं विबी जी राम जी जैसी योजना लाकर मजदूरों को रोजगार के नाम पर सपने दिखाकर धोखा देने का काम कर रही है। इसमें 125दिन काम की घोषणा है परन्तु 60दिन क़ृषि कार्य के बहाने काम के मांग को प्रतिबंधित कर दिया, मनरेगा विश्व की सबसे बड़ी रोजगार मुहैया कराने वाली कानून को केन्द्र की 100% जिम्मेवारी होनी चाहिए जिसमें उन्होंने 40%हिस्सा राज्यों के जिम्मे डालकर मनरेगा के वित्तिय पक्ष को कमजोर किया है। चार श्रम कोड लाकर भारत सरकार पूंजीपतियों के हित में मजदूरों के साथ क्रूर मजाक कर रही है।
समर्थकों का कहना है मनरेगा ग्रामीण विकास की जीवनधारा है इसे कमजोर करना भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था को कमजोर करेगी।
